नई दिल्ली | 24 जनवरी 2026जब इस सोमवार (26 जनवरी) को कर्तव्य पथ पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू तिरंगा फहराएंगी, तो वह दृश्य मात्र एक रस्म नहीं होगा। 77वां गणतंत्र दिवस भारत की उस यात्रा का साक्षी बनेगा, जिसने 1950 के नवजात लोकतंत्र को 2026 की एक वैश्विक महाशक्ति में बदल दिया है। इस वर्ष का समारोह विशेष है—न केवल इसलिए कि यूरोपीय संघ (EU) का शीर्ष नेतृत्व हमारे मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित है, बल्कि इसलिए भी कि इस बार की थीम हमारे राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' के 150 वर्षों को समर्पित है।अतीत का गौरव: वंदे मातरम की गूंज बैंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित 'वंदे मातरम' ने कभी पराधीन भारत में स्वतंत्रता की अलख जगाई थी। आज, 150 साल बाद, यह गीत 'विकसित भारत' के संकल्प का उद्घोष बन गया है। इस वर्ष की परेड में रक्षा मंत्रालय द्वारा तैयार की गई विशेष झांकियां और 'वंदे भारम' नाम से आयोजित होने वाला सांस्कृतिक कार्यक्रम हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है। यह हमें याद दिलाता है कि हमारा गणतंत्र केवल संविधान की धाराओं से नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक चेतना से बना है जिसने हजारों वर्षों से इस भूभाग को एक सूत्र में पिरोया है।संविधान लागू होने के 76 साल पूरे होने पर, हमें बाबासाहेब अंबेडकर और संविधान सभा के उन मनीषियों को नमन करना चाहिए जिन्होंने एक ऐसे दस्तावेज की रचना की, जो आज भी 1.5 अरब लोगों की आशाओं का केंद्र है। तमाम चुनौतियों, युद्धों और आंतरिक संघर्षों के बावजूद, भारत का लोकतंत्र न केवल जीवित है, बल्कि और अधिक प्रखर होकर उभरा है।भविष्य की उड़ान: युद्ध कौशल से अंतरिक्ष तक कर्तव्य पथ पर इस बार की परेड में जो सबसे बड़ा बदलाव दिखेगा, वह है भारतीय सेना का 'बैटल एरे' (Battle Array) फॉर्मेशन। पहली बार दुनिया देखेगी कि कैसे भारतीय सेना युद्ध के मैदान में आक्रमण करती है। यह बदलाव प्रतीकात्मक है—यह दर्शाता है कि भारत अब रक्षात्मक (Defensive) नहीं, बल्कि एक सक्रिय और निर्णायक शक्ति है। स्वदेशी ड्रोन, हल्के लड़ाकू हेलिकॉप्टर 'प्रचंड' और नई 'भैरव' कमांडो बटालियन का प्रदर्शन 'आत्मनिर्भर भारत' की उस सफलता की कहानी है, जिसे दुनिया अब नजरअंदाज नहीं कर सकती।आर्थिक मोर्चे पर, 2026 भारत के लिए एक मील का पत्थर साबित हो रहा है। हम जापान को पछाड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुके हैं। सेमीकंडक्टर मिशन की सफलता और 'गगनयान' के लिए तैयार हमारे अंतरिक्ष यात्री (Vyomanauts) यह बताते हैं कि भविष्य की तकनीक में भारत केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि निर्माता होगा।कूटनीतिक विजय: नई धुरी बनता भारत इस वर्ष के मुख्य अतिथि—यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा—की संयुक्त उपस्थिति एक ऐतिहासिक कूटनीतिक जीत है। यह पहली बार है जब ईयू (EU) का शीर्ष नेतृत्व एक साथ किसी देश के राष्ट्रीय समारोह में शामिल हो रहा है। यह स्पष्ट संकेत है कि पश्चिमी दुनिया को अब एक संतुलित और स्थिर साझेदार के रूप में भारत की आवश्यकता है। भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच, भारत 'ग्लोबल साउथ' की आवाज़ और विश्व शांति के लिए एक अनिवार्य ध्रुव बनकर उभरा है।चुनौतियां और संकल्प हालाँकि, गौरव के इन क्षणों में हमें आत्ममंथन भी करना होगा। 'अतीत के गौरव' और 'भविष्य की उड़ान' के बीच कहीं वर्तमान की चुनौतियां न छूट जाएं। आर्थिक असमानता, जलवायु परिवर्तन का बढ़ता संकट और युवाओं के लिए गुणवत्तापूर्ण रोजगार का सृजन—ये वो मोर्चे हैं जिन पर अभी निर्णायक जीत हासिल करना बाकी है। गणतंत्र की असली सफलता तब होगी जब संविधान में निहित न्याय, स्वतंत्रता और समता का अधिकार अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक निर्बाध रूप से पहुंचेगा।निष्कर्ष 77वां गणतंत्र दिवस हमें यह संदेश देता है कि भारत की उड़ान अब रोके नहीं रुकेगी। हमारे पास अतीत का आशीर्वाद है और भविष्य को गढ़ने का साहस भी। आइए, इस गणतंत्र दिवस पर हम केवल दर्शक न बनें, बल्कि उस 'अमृत काल' के सिपाही बनें जो 2047 में भारत को परम वैभव के शिखर पर ले जाएगा।वंदे मातरम! जय हिन्द!